ग़ज़ल
अब अपने आपको पत्थर समझ लिया हमनें
तुम्हारी याद के पलको पे अश्क़ रौशन थे
अंधेरी शब को मुनव्वर समझ लिया हमने
ये ख़ुद फ़रेबी नहीँ है तो और क्या कहिये
हर एक साये को पैकर समझ लिया हमने
सुपुर्द कर दिये सारे हुक़ूक़ रहज़न को
ये किस ज़लील को रहबर समझ लिया हमने
तमाम जिस्म थकावट से चूर चूर हुआ
तब इस ज़मीन को बिस्तर समझ लिया हमनें
हमारी भूल थी क़द में बहुत जो छोटे थे
उन्हें भी क़द के बराबर समझ लिया हमने
वो जिसने जान अज़ीयत में डाल दी मश्कूर
उसे ही जान से बढ़कर समझ लिया हमने
मश्कूर ममनून कन्नौजी

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