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ये जो बाईं तरफ़ सीने का

ये जो बायीं तरफ़ सीने के मेरे अगला हिस्सा है यहीँ पे हाथ रख दो तुम यहीँ से दर्द उठता है अरे ओ भूलने वाले तुझे कैसे भुलाऊँ मैं मेरा तो हाफ़िज़ा ऐसा है सबकुछ याद रहता है मुक़र्रर वक़्त है सबका कभी ये भूल मत जाना के जिसका वक़्त हो जाये उसे फिर लौट जाना है बदन की ख़्वाहिशें नापाक कर देती हैं जिस्मों को मुहब्बत तो इबादत है इबादत कौन करता है किसी से पूछ लो आकर यक़ी ऐसे नहीं होगा तुम्हारे बाद क्या हमको किसी ने हँसते देखा है भरोसा उठ गया मश्कूर अब दुनिया के लोगों से ख़ुदा की ज़ात पर लेकिन हमें पूरा भरोसा है

ग़ज़ल

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तेरा फ़िराक़ मुक़द्दर समझ लिया हमनें अब अपने आपको पत्थर समझ लिया हमनें तुम्हारी याद के पलको पे अश्क़ रौशन थे अंधेरी शब को मुनव्वर समझ लिया हमने ये ख़ुद फ़रेबी नहीँ है तो और क्या कहिये हर एक साये को पैकर समझ लिया हमने सुपुर्द कर दिये सारे हुक़ूक़ रहज़न को ये किस ज़लील को रहबर समझ लिया हमने तमाम जिस्म थकावट से चूर चूर हुआ तब इस ज़मीन को बिस्तर समझ लिया हमनें हमारी भूल थी क़द में बहुत जो छोटे थे उन्हें भी क़द के बराबर समझ लिया हमने वो जिसने जान अज़ीयत में डाल दी मश्कूर उसे ही जान से बढ़कर समझ लिया हमने मश्कूर ममनून कन्नौजी

आपकी याद आ रही है हमें

किस कदर ख़ुशियाँ साथ लाई है देखिये आज ईद आई है सबके चेहरों पे मुस्कुराहट है आज ख़ुशियों के दिन की आहट है पर मुझे कोई भी ख़ुशी ही नहीं जैसे आँखों में रौशनी ही नहीं सारे जज़्बे उदास  हैं मेरे आप ही आस पास हैं मेरे शफ़क़तों का अज़ीम साया थे आप मेरे लिए तो क्या क्या थे हर मसाईल का हल निकलता था दर्दो ग़म का बदल निकलता था प्यार से पास में बिठाते थे फिर मुहब्बत बहुत लुटाते थे मैं तो भटका हुआ था दुनिया में मैंने क्या क्या किया था दुनिया में हर ख़ता से बचा लिया मुझको और अपना बना लिया मुझको गन्दगी से मुझे निकाल दिया  नेक रस्ते पे मुझको डाल दिया सदका जारी था रहनुमाई का वक़्त फिर आ गया जुदाई का जो भी आया है उसको जाना है क़ब्र ही आख़िरी ठिकाना है आपसे आज कितनी दूरी है ये भी अल्लाह की ही मर्ज़ी है आपको कैसे भूल जायें हम  ईद कैसे भला मनायें हम  देखो कितना रुला रही है हमें आपकी याद आ रही है हमें आपकी याद आ रही हमें

हुक्मे ज़िल्ल ए इलाही

हुक्म जिल्ले इलाही का जारी हुआ फिर फ़ज़ाओं में इक ख़ौफ़ तारी हुआ आने वालों की हर रहगुज़र रोक दो क़ाफ़िले ही नहीं तुम सफ़र रोक दो अब यहाँ उनकी कोई ज़रूरत नहीं भूखे नंगों से कोई मोहब्बत नहीं चीख़ते रोते बच्चों की आहों से क्या इन ग़रीबों की हमको सदाओं से क्या हिन्दू मुस्लिम नहीं वो तो मज़दूर हैं हाँ इलेक्शन अभी तो बहुत दूर हैं बाद में उनपे चश्मा चढ़ायेंगे हम  धर्म के नाम पर फिर लड़ाएंगे हम  वोट लेकर उन्हें भूल जायेंगे हम  धर्म से फिर सिंहासन को पायेंगे हम फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं हमको उनसे अभी कोई क़ुर्बत नहीं इनकी तकलीफ़ कम करने वाला नहीं ज़ख़्म इनके कोई भरने वाला नहीं जुर्म इनका है ये ही सज़ा पायेंगे इस अज़ीयत से कितने ही मर जाएंगे ये तो मजबूर हैं क्या भला पायेंगे भूल हमसे हुई ये सज़ा पायेंगे मुफ़लिसों को मुहब्बत का हक़ ही नहीं इनको मश्कूर राहत का हक़ का हक़ ही नहीं तुम ही कहते हो ये राम का राज है फिर परेशान क्यूँ हर कोई आज है इल्तजा है ग़रीबों की आहें न लो तख़्त तुमको मिला बद्दुआएं न लो मश्कूर ममनून कन्नौजी

नज़्म ( मैं तो मज़दूर हूँ)

दिल पे पत्थर रखा दर ब दर आ गया घर के आँगन को मैं छोड़कर आ गया मेरे बच्चों के अरमां निकल जाएंगें गाँव से शहर ये सोचकर आ गया फ़िक्र होती है घर की मुझे भी मगर घर की ख़ातिर ही घर से बहुत दूर हूँ मैं तो मज़दूर हूँ मैं तो मज़दूर हूँ ख़्वाब कल के सुहाने सजाये हुए ज़िम्मेदारी को सर पे उठाये हुए कितनी मुश्किल से मैं इतनी महंगाई में  पैसे घर भेजता था कमाये हुए मुझको आराम का कोई हक़ ही नहीं क्या बताऊँ तुम्हें कितना मजबूर हूँ मैं तो मज़दूर हूँ मैं तो मज़दूर हूँ कारखानों में इक रोज़ ताले पड़े  खाने पीने नहाने के लाले पड़े वापसी के सफ़र को बयां क्या करूँ  होंठ सूखे हैं पैरों में छाले पड़े  वक़्त के साथ भरते नहीं घाव यूँ जो भरेगा नहीं मैं वो नासूर हूँ  मैं तो मज़दूर हूँ मैं तो मज़दूर हूँ पैसे वालों को सारी सहूलत मिली  हम ग़रीबो को लेकिन अज़ीयत मिली जिनको परदेस से लाये हैं पूछिए क्या हुक़ूमत उन्हीं की बदौलत मिली  मेरी आँखों में झाँको मेरे रहनुमा देखिए आज कितना मैं माज़ूर हूँ मैं तो मज़दूर हूँ मैं तो मज़दूर हूँ ऐ मेरे मुल्क़ के वासियों देख लो मेरी हालत मेरे साथियों देख लो रहनुमाई पे कोई भरोसा...

Ghazal

 ज़िन्दगी दर्द के साये में बसर करता रहा उम्र भर मैं तेरी यादों का सफ़र करता रहा दोस्त अहबाब अकारिब थे सभी अपने थे कौन था फिर जो इधर की है उधर करता रहा मश्कूर ममनून